Monday, April 9, 2007

प्रारम्‍भ से पहले

वाद संवाद हिन्‍दी पत्रिका की जब मैंने जामिआ मिल्लिया इस्‍लामिया में अध्‍ययन के दौरान शुरु किया था तो एक सपना यह भी देखा था कि मैं इसका वेब संस्‍करण भी निकालूं, लेकिन संसाधन की कमी की वजह से ऐसा हो नहीं पाया. संचार माध्‍यमों की विकास ने तो जैसे हमें सारा आकाश ही दे दिया है. जब से ब्‍लॉग की शुरुआत हुई है. हमें लगता है कि हमारे सपने पूरे हो गये हैं. हिन्‍दी में ब्‍लॉगिंग को बढ़ावा देने में जिन लोगों ने अपना योगदान दिया है, उसे भूलाया नहीं जा सकता.
मोहल्‍ला वाले अविनाश भैया का मैं ऋणी हूं जिन्‍होंने मुझे ब्‍लॉग बनाना सीखाया और इसके लिए मुझे प्रोत्‍साहित किया. हिन्‍दी में ब्‍लॉग से जरिये एक नयी दुनिया से मेरा सम्‍पर्क हुआ. एक ऐसा मंच मिला जहां से मैं अपने मन की बात सारी दुनिया के सामने रख सकता हूं. और लोगों से उनकी दिल की बात दूसरों तक पहुंचा सकता हूं.

Saturday, February 10, 2007

आमंत्रण

कथाकारों से कहानियां आमंत्रित हैं. कहानियां कम से कम 700 शब्‍द और अधिक से अधिक 1200 शब्‍दों के बीच होनी चाहिए. रचना के साथ अपना परिचय और तस्‍वीर अवश्‍य भेजें.

संपादक

नयी किताब

सिर्फ तुम्‍हारा (कविता संकलन)ः एम प्रिंस
प्रकाशकः स्‍वपन पब्लिकेशंस
मूल्‍यः 12 रुपये
द्वितीय संस्‍करणः 2003

सिर्फ तुम्‍हारा, एम. प्रिंस की विविध भाव-भूमि पर उपजी रचनात्‍मकता का आस्‍फालन है. जो उसके नये अंखुआए सपनों की झलक देती हैं, शामिल हैं. ये कविताएं पारदर्शी हैं और कवि कुछ भी छुपाकर नहीं रखना चाहता. यही इन कविताओं का धन-बिंदु है. प्रिंस में भविष्‍य की संभावना के बीज अवश्‍य छिपे हुए हैं इस पर उंगली नहीं उठाई जा सकती. ये कविताएं आपके लिए और आपकी ही सोच को उद्घाटित करती हैं. जाहिरन इन्‍हें स्‍वीकृति और दुलार देना भी आपही का दायित्‍व-कर्तव्‍य है.
प्रस्‍तुत कविता इसी संकलन से ली गयी है.

आखिर तुम भी तो लड़की हो

तुमने अपनी सखी से सुना
मैं घूम रहा था
विलिंग्‍टन स्‍ट्रीट पर
रख किसी लड़की के कंधे पर हाथ
झूमता जा रहा था मैं
उस लड़की के साथ
और तुमने तोड़ डाली
अपने पेन की नींब
तुम्‍हारी सखी ने कहा
मुझे चुम रही थी
एक औरत
और मैंने
अपना सिर टिका रखा था
उसके सीने से
तुमने फाड़ डाले मेरे सारे प्रेमपत्र

जब तुम्‍हारी सखी ने कहा
मैं गले मिल रहा था एक लड़की से
सिनेमा हाल के पास
और तुमने तोड़ डाला
मेरे फोटो फ्रेम को
हो गये थे उसके कई टुकड़े.
तुमने कुछ भी नहीं पूछा मुझसे
क्‍या पता तुम विश्‍वास भी करो मेरी बातों का
लेकिन कैसे कहूं
मैं अपनी छोटी बहन को लिए
बिलिंग्‍टन स्‍ट्रीट गया था
उसके जन्‍म दिन पर लेने केक

मेरी टीचर सिस्‍टर रोज ने चूमा था मुझे
बहुत दिनों बाद
मिला था मैं
अपने क्‍लासमेट जेनी से
उस दिन.
भला तुम
कैसे मानोगी यह सब
आखिर तुम भी तो एक लड़की हो
जानता हूं मैं
दुनिया की सारी लड़कियां
एक-सी होती हैं
भला तुम कैसे अलग हो सकती हो.
फिर भी तुम शायद मान भी जाओ
इन बातों को
लेकिन सोचो
कैसे जोड़ोगी
उस फोटो फ्रेम को
जिसके न जाने
कितने टुकड़े किये हैं तुमने
जिसे सीने से लगा कर
सोती भी थीं तुम
माना बदल सकती हो तुम कांच को
लेकिन तुम अपने
उस दिल का क्‍या करोगी
जिसको तुमने खुद तोड़ा है.

Monday, January 29, 2007

नयी पत्रिका


संवेद 15

हिन्‍दी में जिन छोटी साहित्यिक पत्रिकाओं ने अपनी एक जगह बनाई है, उसमें संवेद भी एक है. संवेद के अब तक मात्र पन्‍द्रह अंक प्रकाशित हुए हैं. ‘संवेद’ का नया अंक मनोहर श्‍याम जोशी पर केन्द्रित है. मनोहर श्‍याम जोशी पर मधुरेश, मृदुला गर्ग, कृष्‍णदत्‍त पालीवाल, सुधीश पचौरी, जवरीमल्‍ल पारख, सत्‍यकाम, रविकान्‍त, संजीव कुमार आदि ने लिखा है. वहीं विवेक कुमार जैन और मनोहर श्‍याम जोशी की बातचीत भी इस अंक को महत्‍तपूर्ण बनाती है. सच्चिदानन्‍द सिन्‍हा (भूमण्‍डलीकरण और सम्‍प्रेषण का संकट), गिरीश मिश्र (धर्म और आर्थिक विकास), रवि श्रीवास्‍तव (मूल्‍यों का विध्‍वंस और उत्‍तर आधुनिकतावाद) के आलेख भी पठनीय हैं.
तुषार धवल, कर्मेन्‍दु शिशिर, सदानन्‍द मिश्र, राधाकृष्‍ण सहाय, योगेन्‍द्र यादव, श्‍याम दिवाकर, सुमन केसरी, रंजना जायसवाल, मृदुला गर्ग, शिवकुमार मिश्र, उद्भ्रान्‍त, कुमार अरुण, ध्रुव शुक्‍ल, प्रभात रंजन, गौरीनाथ, विजेन्‍द्र नारायण सिंह, नीरज खरे, असगर वजाहत आदि के नवीनतम रचनाओं के आप रू-ब-रू होंगे.


सम्‍पादक – किशन कालजयी
मूल्‍य – 50 रुपये
संपर्क – बी-3/44, तीसरा तल
सेक्‍टर-16, रोहिणी,
दिल्‍ली 110 085
फोन नं. +919910284228
सह - सम्‍पादक
राजीव रंजन गिरि
+919868423471
अधिक जानकारी के लिए सम्‍पर्क करें
महेश्‍वर
+919911953266